Today’s Mains Practice
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“Zonal Councils are advisory bodies without binding powers, yet they remain important instruments of cooperative federalism in India.” Discuss their role in resolving inter-State and regional governance challenges.
“क्षेत्रीय परिषदें बाध्यकारी शक्तियों से रहित परामर्शदात्री संस्थाएँ हैं, फिर भी वे भारत में सहकारी संघवाद के महत्वपूर्ण साधन हैं।” अंतर-राज्यीय विवादों और क्षेत्रीय शासन चुनौतियों के समाधान में उनकी भूमिका की विवेचना कीजिए।
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प्रस्तावना
भारत का संघीय ढाँचा केवल संवैधानिक शक्तिविभाजन पर नहीं, बल्कि निरंतर केन्द्र–राज्य और अंतर-राज्य संवाद पर भी निर्भर करता है। राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के अंतर्गत स्थापित क्षेत्रीय परिषदें इसी संवादात्मक संघवाद का संस्थागत माध्यम हैं। हाल में पश्चिमी क्षेत्रीय परिषद की 28वीं बैठक ने इनके महत्व को पुनः रेखांकित किया है।
मुख्य उत्तर
1. विवाद-निवारण का मंच: जल-विवाद, सीमा-संबंधी प्रश्न, परिवहन, प्रवासन और साझा अवसंरचना जैसे मुद्दों पर राजनीतिक टकराव के बजाय वार्ता का अवसर मिलता है।
2. सहकारी संघवाद: केन्द्र और राज्यों के बीच नियमित परामर्श से नीति-समन्वय बढ़ता है तथा एकतरफा निर्णय की प्रवृत्ति कम होती है।
3. आंतरिक सुरक्षा: आतंकवाद, संगठित अपराध, मादक पदार्थ तस्करी, तटीय सुरक्षा और अंतर-राज्य अपराध जैसे विषय राज्य सीमाओं से परे हैं; परिषदें संयुक्त रणनीति को बढ़ावा देती हैं।
4. क्षेत्रीय विकास: सड़क, रेल, बंदरगाह, पर्यटन, आपदा प्रबंधन और शहरीकरण जैसी साझा चुनौतियों पर क्षेत्रीय दृष्टिकोण विकसित किया जा सकता है।
5. संघीय विश्वास: राजनीतिक रूप से भिन्न दलों की सरकारों को एक साझा संस्थागत मंच मिलने से संघीय विश्वास और राष्ट्रीय एकीकरण मजबूत होता है।
फिर भी सीमाएँ स्पष्ट हैं—सिफारिशें बाध्यकारी नहीं हैं, कार्यान्वयन धीमा हो सकता है, बैठकें अनियमित हो सकती हैं और कई विषय अन्य संस्थाओं से अतिव्यापित होते हैं।
आगे की दिशा
बैठकों की नियमित समय-सारिणी, निर्णयों की सार्वजनिक प्रगति-रिपोर्ट, समयबद्ध अनुपालन, विषय-विशेष कार्यसमूह, डेटा-साझाकरण तथा नीति आयोग और अंतर-राज्य परिषद के साथ बेहतर समन्वय आवश्यक है।
निष्कर्ष
क्षेत्रीय परिषदों की शक्ति कानूनी बाध्यता में नहीं, बल्कि संवाद, विश्वास और सहमति निर्माण में निहित है। इन्हें सक्रिय बनाकर भारत प्रतिस्पर्धी संघवाद को अधिक सहकारी और समस्या-समाधान आधारित संघवाद में बदल सकता है।
विद्यार्थी के लिए प्रस्तुतीकरण सुझाव
उत्तर में एक छोटा फ्लोचार्ट बनाया जा सकता है: संवाद → समन्वय → सहमति → संयुक्त कार्यवाही → संघीय विश्वास। केवल परिभाषा न लिखें; सुरक्षा, विकास, विवाद-निवारण और संस्थागत सुधार—इन चार आयामों को अवश्य दिखाएँ।
प्रस्तावना
भारत का संघीय ढाँचा केवल संवैधानिक शक्तिविभाजन पर नहीं, बल्कि निरंतर केन्द्र–राज्य और अंतर-राज्य संवाद पर भी निर्भर करता है। राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के अंतर्गत स्थापित क्षेत्रीय परिषदें इसी संवादात्मक संघवाद का संस्थागत माध्यम हैं। हाल में पश्चिमी क्षेत्रीय परिषद की 28वीं बैठक ने इनके महत्व को पुनः रेखांकित किया है।
मुख्य उत्तर
1. विवाद-निवारण का मंच: जल-विवाद, सीमा-संबंधी प्रश्न, परिवहन, प्रवासन और साझा अवसंरचना जैसे मुद्दों पर राजनीतिक टकराव के बजाय वार्ता का अवसर मिलता है।
2. सहकारी संघवाद: केन्द्र और राज्यों के बीच नियमित परामर्श से नीति-समन्वय बढ़ता है।
3. आंतरिक सुरक्षा: आतंकवाद, संगठित अपराध, मादक पदार्थ तस्करी, तटीय सुरक्षा और अंतर-राज्य अपराध जैसे विषय संयुक्त रणनीति की मांग करते हैं।
4. क्षेत्रीय विकास: सड़क, रेल, बंदरगाह, पर्यटन, आपदा प्रबंधन और शहरीकरण जैसी साझा चुनौतियों पर क्षेत्रीय दृष्टिकोण विकसित किया जा सकता है।
5. संघीय विश्वास: राजनीतिक रूप से भिन्न सरकारों को साझा मंच मिलने से राष्ट्रीय एकीकरण मजबूत होता है।
सीमाएँ: सिफारिशें बाध्यकारी नहीं हैं; कार्यान्वयन धीमा हो सकता है; बैठकें अनियमित हो सकती हैं और कई विषय अन्य संस्थाओं से अतिव्यापित होते हैं।
आगे की दिशा: नियमित बैठकें, निर्णयों की सार्वजनिक प्रगति-रिपोर्ट, समयबद्ध अनुपालन, विषय-विशेष कार्यसमूह, डेटा-साझाकरण तथा नीति आयोग और अंतर-राज्य परिषद के साथ बेहतर समन्वय।
निष्कर्ष
क्षेत्रीय परिषदों की शक्ति कानूनी बाध्यता में नहीं, बल्कि संवाद, विश्वास और सहमति निर्माण में निहित है। इन्हें सक्रिय बनाकर भारत प्रतिस्पर्धी संघवाद को अधिक सहकारी और समस्या-समाधान आधारित संघवाद में बदल सकता है।
विद्यार्थी सुझाव: संवाद → समन्वय → सहमति → संयुक्त कार्यवाही → संघीय विश्वास का छोटा फ्लोचार्ट बनाएं।
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